रविवार, 21 अगस्त 2011

राहु तथा केतु

ज्योतिष शास्त्रानुसार राहु तथा केतु छाया ग्रह हैं। राहु या केतु जिस भाव में बैठते हैं, उस भाव के स्वामी के समान बन जाते हैं तथा जिस ग्रह के साथ बैठते हैं, उस ग्रह के गुण ग्रहण कर लेते हैं। राहु, शनि के अनुरू प विच्छोदात्मक ग्रह हैं। अत: ये जिस भाव में होता है संबंधित भाव में विच्छेद कर देता है। उदाहरण के लिए ये चौथे भाव में होने पर माता से विच्छेद, पांचवें भाव में होने पर पुत्र से, सप्तम में होने पर पत्नी से, दसवें भाव में होने पर पिता से विच्छेद करा देता है। केतु ग्रह जिस ग्रह के साथ बैठता है उसके प्रभाव को बहुत अधिक बढ़ा देता है।
ऋषि पराशर मत में राहु की उच्च राशि वृषभ तथा केतु की उच्च राशि वृश्चिक मानी गई है। अन्य ज्योतिषियों ने राहु की उच्च राशि मिथुन तथा केतु की उच्च राशि धनु मानी है। वर्तमान में यही मत प्रभावी है। अत: ये दोनों ग्रह अपना शुभाशुभ फल किसी अन्य ग्रह के सहयोग से दे पाते हैं। तीसरे, छठे, दसवें भाव का कारक ग्रह राहु है। दूसरे तथा आठवें भाव का कारक ग्रह केतु है। राहु-केतु से निर्मित विशिष्ट अशुभ योग- [1] जब चंद्र, सूर्य ग्रह राहु के संसर्ग में आते हैं, तो कुंडली में ग्रहण योग निर्मित होता है। जो कि एक अशुभ योग है।
[2] राहु और केतु के मध्य सभी ग्रह आ जाने पर कुंडली में कालसर्प योग निर्मित होता है।
सावधानी: इस योग के अध्ययन में ध्यान रखना चाहिए कि राहु मुख का कारक है। जब ग्रह केतु से राहु की ओर अग्रसर होते हैं, तो उस स्थिति में सभी ग्रहों का ग्रहण काल की ओर अग्रसर होना कहलाता है। वे ग्रह राहु के मुख में जाकर पीडि़त होते हैं। [यह एक अशुभ योग है]।
जब ग्रह राहु से केतु के मध्य होते हैं, तो उस स्थिति को ग्रहण से मुक्ति की स्थिति कहते हैं। क्योंकि सभी ग्रह राहु के मुख से बाहर की ओर अग्रसर होते हैं। अगर कुंडली में ये योग पाए जाते हैं, तो भी डरने की आवश्यकता नहीं है।

गुरुवार, 18 अगस्त 2011

मूलांक व भाग्यांक

अंकशास्त्र में हर अंक किसी न किसी ग्रह से संबंद्ध है। अंक ज्योतिष में 1 से लेकर 9 तक की संख्या ग्रहों, उनकी दशा व उनके लक्षण को दर्शाता है। आपकी जन्मतिथि यदि 1 से 9 तक है जो वह अंक आपका मूलांक है, लेकिन यदि अंक 9 से अधिक है तो दोनों अंकों के जोड़ से जो अंक प्राप्त होगा उसे मूलांक माना जाएगा। उदाहरण के लिए यदि आपकी जन्म तिथि 14 (1+4) है तो मूलांक पांच होगा। इसी तरह पूरी जन्म तिथि को जोड़ने से जो अंक प्राप्त होगा, उसे अंक शास्त्र में भाग्यांक कहते है। उदाहरण के लिए यदि आपकी जन्म तिथि 14 नवंबर 1977 है तो आपका भाग्यांक(1+4+1+1+1+9+7+7) 4 होगा। मूलांक जहां व्यक्ति के चरित्र को दर्शाता है, वहीं भाग्यांक भविष्य की घटनाओं का संकेत देता है।
अंकशास्त्र में मूलांक व भाग्यांक दोनों की गणना का प्रभाव है। यदि किसी व्यक्ति का भाग्यांक उसके मूलांक से अधिक प्रबल है तो मूलांक अपना चरित्र करीब-करीब खो देता है, लेकिन यदि मूलांक भाग्यांक से अधिक प्रबल है तो भाग्यांक उस पर अधिक हावी नहीं हो पाता है।
किसी के जन्म तिथि में एक अंक दो से अधिक बार आता है तो वह अंक व उसका मालिक ग्रह अपने मूल चरित्र को छोड़कर विपरीत अंक व उसके मालिक ग्रह के चरित्र को अपना लेता है। स्वभावत: 8 अंक वाले अंतरमुखी होते हैं, क्योंकि उनका मालिक शनि ग्रह है। लेकिन यदि कोई व्यक्ति 8 अगस्त 2008 को पैदा हुआ हो तो वह बहिमुखी होगा। क्योंकि उसके जन्मतिथि में 8 की बहुतायत के चलते वह विपरीत अंक 4 व उसके मालिक ग्रह राहु की चारित्रिक विशेषता को अपना लेगा, जिस कारण उसका स्वभाग बहिर्मुखी हो जाएगा।
शादी के वक्त अक्सर दो लोगों की ज्योतिषीय कुण्डली मिलाई जाती है। अंक शास्त्र में यह और भी आसान है। अंक शास्त्र में जन्मतिथि के आधार पर दो लोगों के स्वभाग व भविष्य की तुलना आसानी से की जाती है। मान लीजिए यदि दो व्यक्तियों की जन्मतिथि, माह व वर्ष में कोई एक अंक दो से अधिक बार आ रहा है तो दोनों में किसी भी सूरत में नहीं निभ सकती है। ऐसे व्यक्तियों की आपस में शादी न हो तो ही बेहतर है।

अंकशास्त्र और शनि

अंकशास्त्र में ८ का अंक शनि को प्राप्त हुआ है.आपका जिस तारीख को जन्म हुआ है,गणना करिये,और योग अगर ८ आये,तो आपका अंकाधिपति शनिश्चर ही होगा.जैसे-८,१७,२६ तारीख आदि.यथा-१७=१+७=८,२६=२+६=८.
अंक आठ वाले जातक धीरे धीरे उन्नति करते हैं,और उनको सफ़लता देर से ही मिल पाती है.परिश्रम बहुत करना पडता है,लेकिन जितना किया जाता है उतना मिल नही पाता है,जातक वकील और न्यायाधीश तक बन जाते हैं,और लोहा,पत्थर आदि के व्यवसाय के द्वारा जीविका भी चलाते हैं.दिमाग हमेशा अशान्त सा ही रहता है,और वह परिवार से भी अलग ही हो जाता है,साथ ही दाम्पत्य जीवन में भी कटुता आती है. शनि प्रधान जातक तपस्वी और परोपकारी होता है,वह न्यायवान,विचारवान,तथा विद्वान भी होता है,बुद्धि कुशाग्र होती है,शान्त स्वभाव होता है,और वह कठिन से कठिन परिस्थति में अपने को जिन्दा रख सकता है.जातक को लोहा से जुडे वयवसायों मे लाभ अधिक होता है.शनि प्रधान जातकों की अन्तर्भावना को कोई जल्दी पहिचान नही पाता है.जातक के अन्दर मानव परीक्षक के गुण विद्यमान होते हैं.शनि की सिफ़्त चालाकी,आलसी,धीरे धीरे काम करने वाला,शरीर में ठंडक अधिक होने से रोगी,आलसी होने के कारण बात बात मे तर्क करने वाला,और अपने को दंड से बचाने के लिये मधुर भाषी होता है.दाम्पत्यजीवन सामान्य होता है.अधिक परिश्रम करने के बाद भी धन और धान्य कम ही होता है.जातक न तो समय से सोते हैं और न ही समय से जागते हैं.हमेशा उनके दिमाग में चिन्ता घुसी रहती है.वे लोहा,स्टील,मशीनरी,ठेका,बीमा,पुराने वस्तुओं का व्यापार,या राज कार्यों के अन्दर अपनी कार्य करके अपनी जीविका चलाते हैं.शनि प्रधान जातक में कुछ कमिया होती हैं,जैसे वे नये कपडे पहिनेंगे तो जूते उनके पुराने होंगे,हर बात में शंका करने लगेंगे,अपनी आदत के अनुसार हठ बहुत करेंगे,अधिकतर जातकों के विचार पुराने होते हैं.उनके सामने जो भी परेशानी होती है सबके सामने उसे उजागर करने में उनको कोई शर्म नही आती है.शनि प्रधान जातक अक्सर अपने भाई और बान्धवों से अपने विचार विपरीत रखते हैं,धन का हमेशा उनके पास अभाव ही रहता है,रोग उनके शरीर में मानो हमेशा ही पनपते रहते हैं,आलसी होने के कारण भाग्य की गाडी आती है और चली जाती है उनको पहिचान ही नही होती है,जो भी धन पिता के द्वारा दिया जाता है वह अधिकतर मामलों में अपव्यय ही कर दिया जाता है.अपने मित्रों से विरोध रहता है.और अपनी माता के सुख से भी जातक अधिकतर वंचित ही रहता है.

मंगलवार, 16 अगस्त 2011

शुक्र की महादशा


शुक्र में शुक्र- 1, 4, 5, 7, 9 10वें भाव में बली शुक्र हो तो इस दशा में व्यक्ति को धन प्राप्ति, श्रेष्ठ कार्यों में रूचि, पुत्र की प्राप्ति, कल्याण, सम्मान, अकस्मात धन प्राप्ति, नए घर का निर्माण आदि फल मिलते हैं। दायेश से 6, 8, 12वें भाव में नीच या अस्तंगत राहु हो तो भय और आर्थिक कष्ट होता है। शुक्र स्वराशि या उच्च का होकर 1, 4, 5वें भाव में हो भाव में हो तो व्यक्ति अनेक नवीन ग्रंथों का निर्माण करता है।
शुक्र में सूर्य- इस दशा में कलह, संताप, दारिद्रय होते हैं। यदि सूर्य उच्च या स्वराशि का हो अथवा दायेश से 1, 4, 5, 7, 9, 10वें भाव में हो तो धन लाभ, सम्मान, शासन की प्राप्ति, माता-पिता से सुख, भाई से लाभ मिलता है। दायेश से 6, 8, 12वें भाव में हो तो चिंता, कष्ट या रोग हो सकते हैं।
शुक्र में चंद्रमा- चंद्रमा उच्च का, स्वराशि का या मित्र वर्ग का हो तो व्यक्ति को उस दशा में स्त्री का सुख, धन लाभ, पुत्री की प्राप्ति, उन्नति, उच्च पद का लाभ मिलता है। यदि चंद्रमा दायेश से 6, 8, 12वें भाव में हो तो व्यक्ति को कष्ट हो सकता है।
शुक्र में मंगल- 1, 4, 5, 7, 9, 10, 11वें भाव में बलवान मंगल स्थित हो तो इस दशा में मनोरथ सिद्धि, धन लाभ, स्थान भ्रंश, कलश आदि होते हैं। यदि दायेश से 6, 8, 12वें भाव में मंगल हो तो रोग, कष्ट, धन की हानि हो सकती है।
शुक्र में राहु- 1/4/5/7/9/10वें भाव में राहु बलवान हो तो इस दशा में कार्य सिद्धि व्यापार में लाभ, सुख, धन-ऎश्वर्य की प्राप्ति होती है। दायेश से 7/8/12वें भाव में हो तो व्यक्ति को कष्ट आदि हो सकते हैं।
शुक्र में गुरू- बलवान गुरू 1/4/5/7/9/10वें भाव में हो तो इस दशा में पुत्र लाभ, कृषि से धन प्राप्ति, यश प्राप्ति, माता-पिता का सुख और इष्ट बंधुओं से मिलना होता है। 6/8/12वें भाव में हो तो कष्ट, चोर भय, पीड़ा एवं हानि होती है।
शुक्र में शनि- इस दशा में क्लेश, आलस्य, व्यापार में हानि या अधिक व्यय होता है। लग्नेश या दायेश से शनि 6,8, 12वें स्थान में हो तो स्त्री को पीड़ा, उद्योग में हानि, द्वितीयेश या सप्तमेश शनि हो तो बीमारी हो सकती है।
शुक्र में बुध- बलवान बुध 1, 4, 5, 7, 9, 10वें भाव में हो, लग्नेश, चतुर्थेश या पंचमेश से युक्त हो तो इस दशा में साहित्यिक कार्यों द्वारा धन, कीर्ति लाभ, संमार्ग से धनागम, बड़े कार्यों में अधिक सफलता मिलती है। यदि दायेश से 6, 8, 12वें भाव में हो तो अपकीर्ति, अल्प लाभ, कुटुंबियों से झगड़ा हो सकता है।
शुक्र में केतु- इस दशा में कलह, शत्रु पीड़ा, भय, धन हानि हो सकती है। दायेश से 6, 8, 12वें भाव में पाप ग्रह से युक्त केतु हो तो सिर में रोग, घाव अर्थात शारीरिक पीड़ा जैसे फल मिलना संभव है।

परिवार,धन और वाणी का भाव


कुण्डली के दूसरे भाव को द्वितीय भाव भी कहते है. यह भाव पनफर भाव, मारक स्थान भी कहलाता है. द्वितीय भाव को धनभाव, कुटुम्ब स्थान, वाक स्थान के नाम से भी जाना जाता है.
द्वितीय भाव का कारक ग्रह गुरु है. गुरु इस भाव से परिवार और धन का प्रतिनिधित्व करता है. व्यक्ति की वाणी के लिए बुध का विचार किया जाता है. शुक्र-परिवार, सूर्य और चन्द्रमा से व्यक्ति की आंखों का विश्लेषण किया जाता है.
परिवर्तन योग
द्वितीयेश और तृ्तीयेश दोनों परिवर्तन योग में हों, तो खल योग बनता है. यह खल योग व्यक्ति को सरकारी क्षेत्रों में प्रतिष्ठा दिलाने में सहयोग करता है.
द्वितीयेश और चतुर्थेश का परिवर्तन योग होने पर एक उत्तम विद्या योग बनता है. यह एक शुभ योग है. इस योग की शुभता से व्यक्ति को उच्च शिक्षा, परिवार से सहयोग, सम्पति से या ननिहाल के सम्बन्धियों से उच्च आर्थिक सामर्थ्य प्राप्त होना.
द्वितीयेश और पंचमेश दोनों परिवर्तन योग बना रहे हों, तो व्यक्ति की धन-सम्पति में बढोतरी होती है. उसका बडा परिवार, परिवार से लगाव, बुद्धिमतापूर्ण भाषा, कमाऊ संतान आदि देता है.
द्वितीयेश और षष्टेश आपस में परिवर्तन योग कर रहे हों, तो व्यक्ति को मुकद्दमेबाजी और स्वास्थय संबन्धी विषयों पर व्यय करने पडते है. उसे नौकरी से लाभ प्राप्त होते है. तथा जीवन साथी के स्वास्थय में कमी रहने के योग बनते है.
द्वितीयेश और सप्तमेश जब परिवर्तन् योग बनाते है, तो व्यक्ति को प्रभुत्व वाला जीवन साथी मिलता है. उसका अच्छा पारिवारिक जीवन होता है. साझेदारों के द्वारा लाभ प्राप्त होते है. तथा और सास-ससुर से धन -सम्पति की प्राप्ति होती है.
द्वितीयेश और अष्टमेश परिवर्तन योग में शामिल होंने पर दुरयोग बनता है. यह अशुभ योग है. तथा इससे व्यक्ति के आर्थिक संकट, असन्तोषपूर्ण पारिवारिक जीवन, आंखों और दान्तों कि समस्या आ सकती है.
द्वितीयेश और नवमेश से बनने वाला परिवर्तन योग धन योग कहलाता है. धनयोग व्यक्ति के धन में बढोतरी करता है. पिता, सरकार और विदेश से धन प्राप्त करने में सहयोग करता है. इस योग के व्यक्ति को वाहन, 32 साल की आयु के उपरान्त अधिक भाग्यशाली बनाते है, परिवार की धन -सम्पति में बढोतरी होती है.
द्वितीयेश और दशमेश परिवर्तन योग बन रहा है. यह योग व्यक्ति को धनी बनाता है. व्यापार के द्वारा अतिशय लाभ और आय, उच्च पद आदि दिलाता है. अगर दशमेश पीडित हों, तो व्यक्ति अपने पद का दुरुपयोग करने से पीछे नहीं हटता है. और गुप्त तरीको से आय प्राप्त करने का प्रयास करता है.
द्वितीयेश व एकादशेश जब परिवर्तन योग बना रहे हों, तो व्यक्ति को व्यापार में लाभ प्राप्त होता है. धन और सम्पति के पक्ष से भी यह योग अनुकुल होता है. विवाह के उपरान्त भाग्य में बढोतरी होती है.
द्वितीयेश तथा द्वादशेश से बनने वाला परिवर्तन योग व्यक्ति की आय और व्यय दोनों में बढोतरी करता है. दोनों के पीडीत होने पर व्यक्ति की आंखों में समस्याएं, उन्नति के लिए पारिवारिक स्थितियों के कारण परिवार से वियोग होने के योग बनते है. यह योग व्यक्ति को विदेशी व्यापार से लाभ दिलाता है.
अन्य योग
दूसरे भाव में बुध चन्द्रमा या बुध गुरु की युति व्यक्ति को धनी बनाती है.
द्वितीयेश का तीसरे भाव में होने का अर्थ है, कि छोटे भाई से व्यक्ति सभी प्रकार की सहायता, संगीतज्ञ, प्रसिद्धि, और धन प्राप्त करता है.
चौथे भाव में चतुर्थेश के साथ बैठा, द्वितीयेश आर्थिक लाभ, भूमि, वाहन, घरों आदि का लाभ देता है.
पांचवें भाव में पंचमेश के साथ बैठा द्वितीयेश समृ्द्ध संतान, बौद्धिक कार्य और अमीरी को दर्शाता है.
छठे भाव में षष्टेश के साथ बैठा द्वितीयेश समृ्द्ध मामालों और धनवान व्यक्तियों के साथ शत्रुता दर्शाता है.
सातवें भाव में सप्तमेश के साथ बैठा द्वितीयेश अच्छा दहेज और धनवान सास-ससुर देता है.
आंठवें भाव में अष्टमेश और द्वितीयेश की युति व्यकि को सन्ताप, कृ्पणता, ऋण चुकाने में असमर्थता, जीवन साथी के स्वास्थय में कमी का योग बनाती है.
नवम भाव में नवमेश और द्वितीयेश युति सम्बन्ध में हों तो व्यक्ति का पिता धनी, उचित्त तरीकों से आय और ज्ञानी व्यक्तियों से मित्रता रखने वाला होता है.
दशवें भाव में दशमेश के साथ द्वितीयेश स्थित हों, तो व्यक्ति को उच्च पद, लाभ प्राप्त होते है.
द्वितीयेश और एकादशेश की युति व्यक्ति को अचानक से धनी बनाती है.
द्वितीयेश और द्वादशेश का युति सम्बध होने पर व्यक्ति धन वृ्द्धि करता है. परन्तु मन्द गति से.

रविवार, 14 अगस्त 2011

मंगल व केतु

मंगल को नवग्रहों में तीसरा स्थान प्राप्त है और केतु को नवम स्थान फिर भी ज्योतिष की पुस्तकों में कई स्थान पर लिखा मिलता है कि मंगल एवं केतु समान फल देने वाले ग्रह हैं . ज्योतिषशास्त्र में मंगल एवं केतु को राहु एवं शनि के समान ही पाप ग्रह कहा जाता है. मंगल एवं केतु दोनों ही उग्र एवं क्रोधी स्वभाव के माने जाते हैं. इनकी प्रकृति अग्नि प्रधान होती है. मंगल एवं केतु एक प्रकृति होने के बावजूद इनमें काफी कुछ अंतर हैं एवं कई विषयों में मंगल केतु एक समान प्रतीत होते हैं.
समानता
मंगल व केतु दोनों ही जोशीले ग्रह हैं. लेकिन, इनका जोश अधिक समय तक नहीं रहता है. दूध की उबाल की तरह इनका इनका जोश जितनी चल्दी आसमान छूने लगता है उतनी ही जल्दी वह ठंढ़ा भी हो जाता है. इसलिए, इनसे प्रभावित व्यक्ति अधिक समय तक किसी मुद्दे पर डटे नहीं रहते हैं, जल्दी ही उनके अंदर का उत्साह कम हो जाता है और मुद्दे से हट जाते हैं . मंगल एवं केतु का यह गुण है कि इन्हें सत्ता सुख काफी पसंद होता है. ये राजनीति में एवं सरकारी मामलों में काफी उन्नति करते हैं. शासित होने की बजाय शासन करना इन्हें रूचिकर लगता है. मंगल एवं केतु दोनों को कष्टकारी, हिंसक, एवं कठोर हृदय वाला गह कहा जाता है. परंतु, ये दोनों ही ग्रह जब देने पर आते हैं तो उदारता की पराकष्ठा दिखाने लगते हैं यानी मान-सम्मान, धन-दौलत से घर भर देते हैं.
विभेद
मंगल केतु में शनि एवं राहु के समान भौतिक एवं अभौतिक का विभेद है अर्थात मंगल सौर मंडल में एक भौतिक पिण्ड के रूप में मौजूद है जबकि केतु चन्द्र के क्रांतिपथ का वह आभाषीय बिन्दु हैं जहां चन्द्र पृथ्वी के पथ को काटकर दक्षिण की तरफ आगे बढ़ता है. मंगल के दो ग्रह हैं मेष एवं वृश्चिक जबकि केतु की अपनी राशि नहीं है. केतु भी राहु की तरह उस राशि पर अधिकार कर लेता है जिस राशि में वह वर्तमान होता है.
मंगल अपने प्रराक्रम के कारण जब किसी के लिए कुछ करने पर आता है तो उसके लिए प्राण न्यौछावर करने के लिए तैयार रहता है. परंतु, इसके पराक्रम का दूसरा पहलू यह है कि अगर यह दुश्मनी करने पर आ जाए तो प्राण लेने से भी पीछे नहीं हटता है. केतु की भी इसी तरह की विशेषता है कि जब यह त्याग करने पर आता है तो साधुवाद धारण कर लेता है. राजसी सुख-वैभव का त्याग करने में भी इसे वक्त नहीं लगता लेकिन, जब पाने की इच्छा होती है तो अपनी चतुराई एवं कुटनीति से झोपड़ी को भी महल में बदल डालता है.

राजनीति और शनि


जिनकी कुंडली में शनि प्रबल होता है वे राजनीति में सफलता हासिल करते हैं।ज्योतिषशास्त्र अनुसार राजनीति का प्रमुख कारक ग्रह शनि को माना गया है। शनि ग्रह जिनके कारक होता है या इसकी स्थिति कुंडली में अच्छी होती है, तो व्यक्ति राजनीति में सफलता पाता है।
जन्म कुंडली में प्रथम, द्वितीय, तृतीय, षष्ट, नवम, दशम एवं एकादश भाव राजनीति के लिए शुभ होते हैं। प्रथम भाव व्यक्ति के स्वास्थ्य के साथ-साथ उसके पूरे परिवेश का जिम्मेदार होता है। द्वितीय भाव धन का कारक भाव होता है और तृतीय पराक्रम का। छठा भाव विरोधी को परास्त कर, जीत का कारक बनता है और अंत में एकादश शुद्ध लाभ एवं इच्छा पूर्ति का भाव होता है।
आज के युग में सफल राजनीतिज्ञ वही होता है जो अपनी ओर जनता को आकर्षित कर चुनाव में अपने विरोधियों को हराकर जीत हासिल करे। इसके लिए यह जरू री है कि किसी भी कुंडली में बुध, मंगल, शनि एवं बृहस्पति का संबंध इन भावों से बनता हो। ऎसा होने के बाद ही एक राजनेता की पहचान जनता के सामने बनेगी और वह चुनाव में जीत सकेगा। ग्रह स्थितियां राजनीतिज्ञ बनाने का माहौल भर पैदा करती हैं, किसी भी चुनाव में हार या जीत मात्र इनकी स्थिति पर निर्भर नहीं होती। वह दशा समय पर निर्भर करती है। इसलिए जिन ग्रहों की महादशा, अंतर एवं प्रत्यंतर दशा चल रही हो, वे भी उक्त भावों से संबंधित होंगे, तब ही चुनाव में जीत होगी।
कुंडली में पंचम भाव एक महत्वपूर्ण भाव होता है। इसको त्रिकोण भी कहा जाता है। पर चुनाव के लिए यह शुभ न होकर, अशुभ फल देता है। इसका कारण स्पष्ट है। षष्ठ भाव विरोधी को परास्त करके चुनाव जीतने का संकेत करता है, तो वही पंचम उसका द्वादश भाव होता है। इसलिए यह शुभ नहीं हुआ। एकादश भाव इच्छा पूर्ति का भाव होता है एवं पंचम एकादश से सातवां भाव होता है। यानी यह विरोधी की इच्छा पूर्ति का भाव होगा। तब इस स्थिति में वह जातक को किस प्रकार मदद कर सकेगा। इसलिए पंचम, बहुत शुभ होते हुए भी, चुनाव के लिए अशुभ स्थिति बनाता है।
किसी कुंडली में सूर्य, मंगल, बुध एवं शनि एक साथ हों, तो व्यक्ति मंत्री बनता है। फिर एक अन्य योग में चंद्र, बुध, बृहस्पति, शुक्र एवं शनि के एक साथ होने पर जातक मंत्री बन जाता है।
इन योगों में एक बात सामान्य पाई जाती है कि बुध एवं शनि को दोनों योगों में होना चाहिए, क्योंकि नेता के अंदर बोलने की शक्ति जरू री है, तो दूसरी ओर उसको जनता का विश्वास भी प्राप्त हो।